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बचना बेटा


ये जो एलजीबीटी का ठप्पा लगाए, प्राइड का झण्डा बुलंद किए फिरते हैं, ऐसे लोगों से बचकर रहना बेटा। ये अपने साथ भी खिलवाड़ करते हैं और प्रकृति के नियम के साथ भी।


मैंने देखा है, तुमने भी देखा होगा - हममें से कई लोग यह मानते हैं कि प्रकृति हमेशा अपनी नाक की सीध में चलती है, कि प्रकृति के लिए किसी एक लिंग से जुड़े होने की शर्त है, विपरीत लिंग के साथ ही प्रेम में पड़ना, उनके साथ ही यौन संबंध बनाना या उसकी इच्छा रखना और उनके साथ ही जीने-मरने की कसमें खाते हुए जीवन बिताना। यानि, पुरुष का महिलाओं के प्रति और महिलाओं का पुरुषों के प्रति यौन आकर्षण। Plain and simple.


हममें से उन कुछ लोगों के लिए यह एक जैविक वास्तविकता है कि विपरीत लिंग के दो लोगों के बीच संबंध प्राकृतिक होते हैं और समान लिंग के दो लोगों के बीच यही संबंध अप्राकृतिक होते हैं। जबकि असल बात कुछ और है और वह बात भी काफी Plain and simple है - समान लिंग के एक-दूसरे के प्रति यौन आकर्षण से प्रकृति को कभी कोई आपत्ति नहीं रही। यह केवल हममें से कुछ लोग और हम द्वारा बनाई गईं कुछ संस्कृतियाँ हैं जो समाज में किसी बेटी का किसी लड़की के साथ प्रेम संबंध होने पर हँगामा खड़ा कर देती हैं। परिवार या समाज के कुछ लोगों द्वारा दिखाए जाते ये नखरे कोई जैविक अनिवार्यता नहीं, बल्कि कई मामलों में तो यह सांस्कृतिक/सामाजिक अनिवार्यता भी नहीं।


बड़ी संख्या में मानव संस्कृतियों ने समलैंगिक संबंधों को न केवल वैध बल्कि सामाजिक रूप से रचनात्मक भी माना है, प्राचीन ग्रीस इसका एक बड़ा उदाहरण है। उदाहरण के तौर पर, आप अलेक्जेंडर द ग्रेट और हेफेस्टियन के आपसी संबंधों पर रिसर्च करें, आपको पता लगेगा कि उनके सम्बन्धों पर उनके परिवार और उस समय के समाज को कोई आपत्ति नहीं रही।


दरअसल हममें से कुछ लोग जैविक रूप से निर्धारित चीज़ों को जैविक मिथकों के माध्यम से उचित ठहराने की कोशिश करते हैं। प्रकृति का एक हिस्सा, जिसे हम जीवविज्ञान कहते हैं, समलैंगिकों को एक-दूसरे के साथ यौन और प्रेम संबंध का आनंद लेने में ठीक उसी प्रकार सक्षम बनाता है, जिस प्रकार विपरीतलैंगिकों को। ये तो हममें से कुछ लोग हैं जो उन्हें इस संभावना को महसूस करने से रोकने की जहमत उठाते रहते हैं।


ऐसे ‘हम’ अक्सर यह तर्क देते हैं कि वे केवल उस चीज़ का निषेध करते हैं जो अप्राकृतिक है। लेकिन सच तो यह है कि जैविक दृष्टिकोण से कुछ भी अप्राकृतिक नहीं है। जो भी संभव है, वह प्राकृतिक भी है। अप्राकृतिक व्यवहार, जो प्रकृति के नियमों के विरुद्ध जाता है, उसका अस्तित्व ही नहीं हो सकता इसलिए उसे कभी किसी निषेध की आवश्यकता ही नहीं होती।


वास्तव में, हमने अपनी अवधारणाएँ 'प्राकृतिक' और 'अप्राकृतिक' जीव विज्ञान के आधार पर नहीं बनाईं। हमारी यह अवधारणा मुख्यतः दो बिन्दुओं पर केन्द्रित हैं:


1. हम यह मानते हैं कि मानव शरीर के प्रत्येक अंग की उत्पत्ति सिर्फ़ किसी एक उद्देश्य की पूर्ति के लिए हुई है। यदि हम अपने उन अंगों का उपयोग उस उद्देश्य के लिए करते हैं तो यह एक प्राकृतिक क्रिया है। लेकिन इससे भिन्न उनका उपयोग करना अप्राकृतिक है। यहाँ यह बात गौर करने वाली है कि हालाँकि हमारे अंगों की उत्पत्ति एक विशेष कार्य करने के लिए होती है, लेकिन जब एक बार वे अस्तित्व में आ जाते हैं तो उन्हें अन्य उपयोगों के लिए भी अनुकूलित किया जाता है। उदाहरण के लिए, शरीर में भोजन-पानी भेजने के लिए मुँह अस्तित्व में आया। हम अभी भी उस उद्देश्य के लिए अपने मुंह का उपयोग करते हैं। पर क्या हमने उसका दूसरा उपयोग करना शुरू नहीं किया? हम उसका उपयोग बोलने में भी करने लगे, सर्दी होने पर साँस लेने, हँसने, अपनी हतप्रभता दर्शाने में भी करने लगे। तो क्या ये उपयोग इसलिए अप्राकृतिक हो गए क्योंकि कई मिलियन वर्ष पहले हमारे पूर्वज जीव ये काम अपने मुँह से नहीं किया करते थे?


यही बात हमारे यौन अंगों और व्यवहार पर भी लागू होती है। सेक्स और अधिकांश प्रेमिल गतिविधियाँ सबसे पहले प्रजनन के लिए विकसित हुईं। लेकिन बहुत से जीवों ने इनका उपयोग कई अन्य उद्देश्यों के लिए भी करना शुरू कर दिया जिनका सरवाइवल और प्रजनन से कोई ख़ास लेना-देना नहीं। उदाहरण के लिए, सेक्स का उपयोग इन्सान और चिंपैंजी राजनीतिक गठबंधनों को मजबूत करने, घनिष्ठता स्थापित करने और तनाव कम करने के लिए करते हैं। आप इन्हें अप्राकृतिक कहने और रोकने की जहमत क्यों नहीं उठाते?


2. हममें से कुछ लोग यह तो याद रखना पसंद करते हैं कि प्रकृति का दूसरा नाम अपनी जैविक प्रतियाँ बनाना (रीप्रोडक्शन) है। इस वजह से समलैंगिक संबंध प्रकृति के विरुद्ध है क्योंकि इसमें प्रजनन की संभावना नहीं। परंतु हममें से वही कुछ लोग यह याद रखना पसंद नहीं करते कि प्रकृति संतुलन बनाए रखने का भी दूसरा नाम है और कहर बरपाने के अलावा भी प्रकृति के पास संतुलन बनाए रखने के काफी रचनात्मक तरीके हैं जो जीवन के आरंभ से ही अस्तित्व में रहे हैं। समलैंगिकों, ट्रांस पुरुषों, ट्रांस महिलाओं, नपुंसकों का अस्तित्व और उनके बीच प्रेम की उत्पत्ति व उनमें यौन/प्रेम संबंध का आनंद उठाने की क्षमता उन रचनात्मक तरीकों में से एक हैं। याद रखें, जो भी संभव है, वही प्राकृतिक है। प्रकृति के नियमों के विरुद्ध जाते अप्राकृतिक व्यवहार का कोई अस्तित्व ही नहीं हो सकता।



प्राकृतिक-अप्राकृतिक-उचित-अनुचित का अंतर जानना आवश्यक है, उतना ही आवश्यक जितना यह जानना कि प्रकृति हमारे विचारों से नहीं चलती। उचित-अनुचित, हमारे ख़ुद के विचार हो सकते हैं, जो सार्वभामिक सच नहीं।


सो सुनो बेटा, ऐसे लोगों से बिल्कुल बचकर रहना जो अपनी अवधारणाओं पर प्रकृति की इच्छा का ठप्पा लगाए, प्रेम सम्बन्धों पर अपने मालिकाना हक का झण्डा बुलंद किए फिरते हों। ये ना ख़ुद से अलग किसी सत्ता को स्वीकार कर पाते हैं, ना प्रकृति को उसकी पूर्णता में अंगीकार कर पाते हैं।


प्रज्ञा तिवारी

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