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ख़त्म होते राब्ता से शुरू होते राब्ता की रवानियाँ यूँ तो कई हैं 
वक़्त होना चाहिये, मुस्कुराकर सुनाने को कहानियाँ यूँ तो कई हैं

Stories: Work

Not a love story

लेडीज़ ऐंड जेंट्लमेन

पेश है नीमो और नेहा की कहानी

that is

Not a love story

कहानी, जो अक्सर हमारी भी होती है, हम बस उसपर ध्यान नहीं दे पाते। तो ढूंढिए अपने-अपने नीमो और नेहा को, उनकी इन कहानियों में 😊


PS: आख़िर थोड़े से नीमो और थोड़े से नेहा तो आप भी हैं!

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Not a love story
Ep 1

कुछ महीनों पहले एक लड़की का बर्थडे था। दोस्तों के साथ हँसती बतियाती उसे ओपेनहाउस कैफ़े से लाइव म्यूज़िक की आवाज़ आई।

‘ऊपर जाकर एक राउंड लगाकर आते हैं’। 

ऊपर गिटार लिए एक लड़का गा रहा था - ‘कोई तेरे ख़ातिर है जी रहा’

घूमते-फिरते इन्हें सीट मिल गई। सिंगर के ठीक सामने वाली। रिक्वेस्ट पर लड़की के लिए ‘बार-बार दिन ये आए’ भी गाया गया। 

एक राउंड लगाकर आने वाले लोग शो के खत्म होने यानि रात 10.30 तक वहाँ बैठे रहे।

‘कुछ तो है तुझसे राबता’ गाने से अपना शो खत्म करने वाला वो लड़का हर रात 10 बजे तक अपना शो खत्म कर देता था। 

#कुछ बातें शुरू ही होती हैं शुरू होने को। 

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Ep 2

“मैं फ़रमाइश भेज सकती हूँ?” – कैफे स्टाफ ने लड़की की 6 गानों की रिक्वेस्ट-लिस्ट गाते हुए लड़के को दी। हर गाने के बाद ‘or’ लिखी लिस्ट में से लड़के ने एक गाना गा दिया। 
Flashback
इंस्टा पर फॉलो करते, स्टोरी-पोस्ट लाइक करते दोनों में बातचीत शुरू हुई। लड़की को कनॉट प्लेस (सीपी) के अगले शो का पता चला।
“आओगे आप?”
“हम तो सीपी वाले ही हैं, आ जाएँगे घूमते-फिरते”
Back to present
बाईं ओर की टेबल पर बैठी, उसके गाने सुनती लड़की पर लड़के की नज़र ब्रेक से ठीक एक गाने पहले गई।
ब्रेक के दौरान :
“तुमने मेरी फरमाइश का सिर्फ एक गाना गाया”
“मुझे नहीं पता था वो आपकी रिक्वेस्ट...अम्म फरमाइश है” 
“वैसे भी हर गाने के बाद or लिखा था सो एक ही गाना बनता था” – लड़की ने शिकायत वापस ली।
“तो शो के एंड तक नहीं रुकोगे?”
“ना, लेट हो जाऊँगी”
ब्रेक के बाद लड़के ने रिक्वेस्ट...सॉरी फरमाइश के बाकी पाँचों गाने गाए।
25 मिनट बीत जाने पर लड़के के इशारों में पूछे गए – ‘गए नहीं?’ के जवाब में लड़की ने ना में सिर हिलाया।
शो के बाद:
“क्या हुआ? मन नहीं किया जाने का?” 
“हाँ, मन नहीं किया”
“मेरा कल भी शो है सीपी में, आओगे?” – सेक्टर 52 मेट्रो स्टेशन पर उतरने से पहले लड़के ने पूछा।
“कल बहुत-बहुत लेट तक ऑफिस है”
“आई विल बी वेटिंग” – दरवाज़ा खुला और लड़का उतर गया।
------
ये नीमो है, ये नेहा। और ये है उनकी छोटी-सी कहानी।

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Ep 3

चैलेंज था कि नेहा का मूड ऑन किया जाएगा।
यह अगले शो की, अगली रात थी। नेहा लेट आई थी और शो के खत्म होने पर सीपी के किसी बेंच पर देर रात तक अकेली बैठने वाली थी। उसका मूड काफ़ी घंटों से काफ़ी खराब था और उसे यक़ीन था कि नीमो चाहे  कुछ भी कर ले, वह फ्रस्ट्रेटेड-इर्रिटेटेड ही रहेगी।
“और अगर मूड ऑन नहीं हुआ मेरा....” – नेहा की धमकी।
“Mm hm? तो?” – स्टेज पर दुबारा जाने की तैयारी करते नीमो ने रुककर कहा।
“तो...मेरा जब तक मन होगा, मैं यहाँ बैठूँगी”
“और अगर मूड अच्छा हो गया तो?”
“तो..देखा जाएगा”
नीमो करीब आया – “तो..आप यहाँ सीपी में नहीं बैठोगे। हमारे साथ चलोगे”
“गारंटी नहीं है”
नीमो ने अपने दोस्त को स्टेज पर चलने को कहा।
15 मिनट की उस नॉन-स्टॉप परफ़ौर्मेंस ने वहाँ मौजूद सभी को शो के अंत तक बंधे रहने को मजबूर कर दिया।
नेहा के फेवरेट गानों से शुरू होकर सिलसिला ‘एक लड़की भीगी भागी’ से होता हुआ जब ‘सर जो तेरा चकराए’ तक पहुँचा तो उसका खराब मूड कहाँ जा चुका था, किसी को याद नहीं। 
याद रह गई तो नेहा को, उसके किसी एक फ़ेवरेट गाने की लाइन भूल जाने पर ‘सॉरी मैं लिरिक्स भूल गया’ कहते हुए नीमो की वो मुस्कान। 
वो हैरानी, जो नीमो के करीब-करीब उसके सभी फेवरेट गाने गा देने पर हुई थी।
वो कन्फ़्यूजन, जहाँ नेहा को समझ नहीं आ रहा था कि वो इस पल को अभी पूरी तरह जी ले या बार-बार जीने को यह परफ़ौर्मेंस रिकॉर्ड कर ले।
और याद रह गया वो अफ़सोस, जो उसे बाद में हुआ था कि क्यों नहीं उसने उस रात नीमो की उस परफॉर्मेंस को रिकॉर्ड कर लिया था।

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Ep 4

“सॉरी, बीच में थोड़ा तेज़ी से खींच लाया आपको” - सड़क पार कर नीमो ने कहा।
“मैं इतनी भी नाज़ुक नहीं!” - फोन पर काम में लगी नेहा को बुरा लगा।
मूड ऑन करने के चैलेंज के मुताबिक, उस रात शो के बाद तीनों एकसाथ जा रहे थे। नीमो और उसका दोस्त पहले ही सड़क की दूसरी ओर पहुँच चुके थे, और नेहा सड़क के इसी किनारे खड़ी मैसेज करने में बिज़ी थी। दोस्त को गाड़ी के पास पहुँचने को कह, नीमो ने वापस सड़क पार की, आती-जाती गाड़ियों को देखा, मैसेज टाइप करती नेहा के कंधों को पकड़ा और ले चला।
नेहा ने न तो एकबार ही नज़र उठाकर उसे देखने की ज़रूरत समझी, न ही सड़क पर चलती गाड़ियों को। कहाँ ठहर जाना है, कहाँ तेज़ी से आगे बढ़ना है, कहाँ वापस पीछे चले जाना है – ये सब देखना नीमो की टेंशन। और नीमो टेंशन में आ गया जब तेज़ी से सामने से गुज़र गई गाड़ी ने भी नेहा को फोन में ही लगाए रखा। अगली तेज़ गाड़ी उन्हें क्रॉस करती, इससे पहले ही नीमो ने नेहा को तेज़ी से खींच सड़क पार कर ली।
“सॉरी, बीच में थोड़ा तेज़ी से खींच लाया आपको”
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पर उसके बाद नीमो ने कभी नेहा को काम के दौरान सड़क पार नहीं कराया, न ही करने दिया। हाँ, एक बार कहा ज़रूर था – “अगर आप एक हाथ से टाइप कर लेते तो मैं हाथ पकड़कर आपको रोड क्रॉस करा देता”। इसपर नेहा ने मुस्कुराकर कहा था – “तुम आगे बढ़ो, मैं बस 5 मिनट में तुमलोगों को जॉइन कर लूँगी। पर सुनो, धीरे चलना, बहुत दूर मत चले जाना”। पर ये कहानी कभी और!
फिलहाल तो नेहा, नीमो और दोस्त गाड़ी में घर जा रहे हैं और पिछली सीट पर बैठी नेहा ने अभी-अभी नीमो को उसकी सीट बेल्ट पकड़ाई है। दोस्त ने अभी-अभी नेहा की फरमाइश ‘ओ रे पिया’ पर ‘नाइस च्वाइस’ कमेन्ट किया है, और अभी-अभी हमारा नीमो मुस्कुरा दिया है।

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Ep 5

“आई नो। आपको पसंद नहीं है।”
“एक्ज़ैक्टली। मुझे पसंद नहीं है।”
“पर यही इनका बेस्ट है”
“नैह, मुझे नहीं....”  कहकर नेहा फोन पर अपनी बात पूरी कर जब वापस आई तो दो प्लेट्स निकल चुकी थीं। एक प्लेट दोस्त ने ली, एक में नीमो ने पनीर और नान डाला।
“मैं पनीर नहीं खाऊँगी यार।” – नेहा ने बहुत गंदा चेहरा बनाया। दुबारा फोन आया। फोन रिसीव करती वह कैफे से बाहर चली गई। जब आई तो फोन पर बात जारी थी।
नीमो ने – “खा लो” – कहा और प्लेट उसकी ओर बढ़ाया।
“तुम कह रहे हो तो बस इतना...” – फोन कान में लगाए नेहा ने फॉर्क से पनीर के एक पीस के आधे टुकड़े किए और मुंह में डालते हुए पूछा – “तुम्हारी प्लेट कहाँ है?” – और जवाब का इंतज़ार न करते हुए वापस चली गई।
तीसरी बार आई तो फोन उसकी पॉकेट में था।
“तुम नहीं खा रहे?” – नेहा के इतना पूछते-पूछते नीमो ने आधे बचे पनीर के उस टुकड़े को प्लेट में रखे नान के साथ लगाया और बाइट अंदर।
नेहा बुदबुदाई – “..पर ये मेरी प्लेट..”
दोस्त मुस्कुराया।
फोर्क हाथ में लिए नेहा नीमो को अपनी प्लेट से नान के टुकड़े तोड़ते, सब्जी में डुबाते और दोस्त से बातें करते, खाते देखती रही।
हालांकि, वो नेहा की प्लेट थी जिसमें नीमो खा रहा था, या नीमो की प्लेट से नेहा ने पनीर के टुकड़े उठाए थे – यह बात सिर्फ वहाँ मौजूद वह दोस्त जानता था।

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Ep 6

“The way he looks at you while singing is not normal”

नेहा की दोस्त ने जब यह बात कही थी, यह उससे पहले की बात है।

कैफे हाउस की उस रात क्या कोई ऐसा गाना था जिसे नीमो ने नेहा को देखे बिना गाया होगा? उत्तर आसान है – नहीं। और यह उत्तर वहाँ बैठा हर शख़्स जानता है। गाने के बोल के साथ नीमो का हर एक्स्प्रेशन और उसकी हर फ्लर्टिश मुस्कान उस रात नेहा के लिए थी।

यह बात नेहा को तब समझ आई जब उसने वहाँ बैठे हर किसी की दिलचस्पी नीमो की परफॉर्मेंस से अधिक नेहा के रिएक्शन में देखी। और नेहा का रिएक्शन? – एक खुशमिज़ाज मुस्कान।  

क्या जो बात नेहा की दोस्त ने बाद में नोटिस की थी, यह उसकी शुरुआत थी? कह नहीं सकते। पर वह एक ऐसी शुरुआत तो थी जो दरअसल एक शुरुआत थी। और क्या शुरू हो रही इस शुरुआत की भनक वहाँ बैठे किसी भी एक शख़्स या ख़ुद नेहा और नीमो को थी?

......क्या जानें!

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Ep 7

“अगर आप एक हाथ से टाइप कर लेते तो मैं हाथ पकड़कर आपको रोड क्रॉस करा देता”। इसपर नेहा ने मुस्कुराकर कहा था – “तुम आगे बढ़ो, मैं बस 5 मिनट में तुमलोगों को जॉइन कर लूँगी। पर सुनो, धीरे चलना, बहुत दूर मत चले जाना”।
ये कहानी आज।
बहुत दूर क्या, जब नेहा ने काम खत्म कर, सड़क पार की तो नीमो और उसके तमाम दोस्त वहीं बेंच पर बैठे, इधर-उधर घूमते, उसे ताकते उसका इंतज़ार कर रहे थे।
“अरे, तुमलोग रुक क्यों गए? मैंने कहा तो था कि धीरे-धीरे आगे बढ़ जाना”
“आप नहीं समझोगे, चलो”
“थोड़ा घूमते हैं यार, अभी घर क्यों जाना है आपको?” – नीमो का एक दोस्त नेहा के काफ़ी करीब आया।
“बंगला साहिब चलते हैं” – दोस्त ने उसपर गौर करते नीमो से कहा।
“हाँ, मैं कभी रात को वहाँ नहीं गई” – नेहा भी एक्साइटेड थी।
“बहुत सुंदर होता है बंगला साहिब रात को” – उस दोस्त ने नेहा से कहा।
नीमो की भवें चढ़ीं – “आपको घर नहीं जाना? टाइम देखो”
“11.15 ही हुए हैं” – एक और दोस्त।
“नोएडा की लास्ट मेट्रो का टाइम होने वाला है” – नीमो मेट्रो की ओर चल दिया। 
कुड़मुड़ करते सब मेट्रो लेने चल पड़े।
धीरे-धीरे और सबसे पीछे चलती नेहा को जब नीमो ने पलटकर देखा तो नेहा खड़ी हो गई, और हाथ पकड़कर जब नीमो ने उसे तेज़ी से चलने का इशारा किया तो उसे एक अर्जेंट काम याद आ गया।  
“एक हाथ से टाइप नहीं कर सकती, यू नो! नहीं तो हाथ पकड़कर ले चल सकते थे तुम मुझे” – बैग से फोन निकालते हुए नेहा मुस्कुराई।
“हम्म”
दोस्त रुक गए।
“मेट्रो तो गई हाथ से। 11.40 होने को हैं, बंगला साहिब.....”
11.49 पर 5 लोगों को नोएडा ले जा रही उस कैब ने 200 रुपये ऊपर से लिए थे।

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Ep 8

गाना ख़त्म करते नीमो की नज़र नेहा पर जब गई तो वह किसी वेटर को बुलाने की कोशिश में थी, पर अफ़सोस कि किसी एक की भी नज़र उसपर नहीं पड़ रही  थी। नीमो स्टेज पर था। स्पॉटलाइट थी उसपर। उसके हर इशारे पर हर स्टाफ की नज़र होती। सो उसने पूरे कॉन्फ़िडेंस से हाथ हिलाया। पर अम्म? ओके? एक और कोशिश। ये भी बेकार। ये तो बेइज्ज़ती हो गई। इतने लोगों के बीच। और अब तो नेहा भी देख रही थी। उसने दोनों हाथ हिलाए और 8-9 सेकण्ड्स तक लगातार ऐसा करते रहने के बाद एक वेटर ने उसे देखा। थैंक गॉड! नेहा ने भी सोचा। नीमो ने सीढ़ियों के पास दोनों की फेवरेट टेबल पर बैठी नेहा की ओर इशारा किया। वेटर ने सिर हिलाया और सीढ़ियों की ओर लपककर बढ़ा। नीमो-नेहा एक-दूसरे को देख मुस्कुराए।
लपककर बढ़े वेटर ने, इशारे के मुताबिक़, अभी-अभी कैफे में आए, सीढ़ियों के पास खड़े, अपने लिए खाली टेबल ढूंढते कपल को अटेंड कर लिया है।
बेतरह हँस पड़ी नेहा ने पास से गुजरे एक वेटर को बुला लिया है।
....नेहा अब वेटर के उसके टेबल के करीब आने तक का इंतज़ार कर लेती है। उसने शर्मिंदगी में अपना सर झुकाते नीमो को आँखों के कोनों से देख लिया था।

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Ep 9

“नाइट आउट की बात कोई कर दे, तू तो रेडी स्टेडी गो...हाँ..? बता दूँ तेरे डैडी को...” 
गाते नीमो ने मुड़कर नेहा को देखा और स्टेज से ही पूछा – “बता दूँ?”
नेहा ‘ना’ में सिर हिलाती हुई हँस पड़ी। हँस पड़ा नीमो भी और साथ में मुस्कुरा पड़े कैफे के स्टाफ भी। कैफे में बैठे विजिटर्स की तरह वे इन्हें न सिर्फ नोटिस किया करते थे बल्कि उन्हें इन दोनों की ऐसी हरकतों की तकरीबन आदत हो चुकी थी।
उस शनिवार नीमो के ठीक सामने गुलाबी कपड़ों में बैठी एक निहायत खूबसूरत विजिटर ने भी नेहा को वहाँ से नोटिस करना शुरू किया।
नीमो का नेहा को देखकर गाना और छेड़ना, नेहा का कुछ न कुछ रेस्पॉन्ड कर हँस देना – गुलाबी कपड़ों वाली विजिटर काफी कुछ समझ चुकी थी।
“वो इंस्टा पर पूछ रही है मुझसे, इज़ शी योर गर्लफ्रेंड?”
“तुमने क्या कहा”
“मैंने कहा शी इज़ अ फ्रेंड। पूछ रही है कि प्रौस्पेक्ट है?”
“हम्म काफी देर से मुझे देख रही है”
“बहुत नोटिस कर रहे हो?” – नीमो की आवाज़ में चुहल थी।
“मैं नहीं कर रही, वो ही कर रही है। वैसे जब तुम ‘मेरे सामने वाली खिड़की में’ गा रहे थे....”
“हम्म, ब्लश कर रही थी वो, देखा मैंने” – नीमो ने बीच में कहा।
नेहा मुस्कुरा दी।
“आप जेलस हो रहे हो?”
“मैं क्यों जेलस होऊँगी”
“वही तो! आप क्यों जेलस होगे?”
नेहा ने अबकी नीमो को देखा – “मैं जेलस होऊंगी तो तुम्हें पता चल जाएगा”
“मुझे पता चल रहा है”
“ओके” - नेहा ने हल्की मुस्कान के साथ फोन उठा लिया।
“वैसे आपने बताया नहीं”
“क्या?”
“प्रोस्पेक्ट हो? गर्लफ्रेंड हो? उसे क्या बोलूँ?”
“उसे बताने में इतने इंटेरेस्टेड क्यों हो? लाइन मारनी है उसपे?”
“मार सकता हूँ!”
“अच्छा! तो अभी मार के दिखाओ”
“पक्का?”
“हाँ! हिम्मत है तो”
“अगर यही बात उस लड़की ने मुझे आपके लिए बोली होती तो?” – नीमो ने नेहा के चेहरे को पढ़ते हुए पूछा।
“तो थप्पड़ खाते तुम”
नेहा के साइड वाले अपने गाल पर नीमो ने धीरे-से हाथ रख लिया।
दोनों हँस पड़े।
शो के बाद गुलाबी कपड़ों वाली उस निहायत खूबसूरत विजिटर का नीमो को दुबारा मैसेज आया था – ‘हू इज़ शी?’
नीमो ने नोटिफिकेशन देखकर मैसेज को बिना पढ़े छोड़ दिया है।

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Ep 10

“आज सीपी जाओगी?”
“क्यों?”
“थर्सडे है भई!”
“तो?”
“हर थर्सडे और मंडे को तुम सीपी जाती हो ना। शो देखने”
नेहा मुस्कुराई। मुस्कुराए ऑफिस के कलीग्स भी।
“आज काम ज़्यादा है, थोड़ा लेट जाऊँगी”–लैपटॉप पर नेहा की अंगुलियाँ जल्दी-जल्दी चल रही थीं। 
“तुम्हारे बिना उसका शो नहीं चलता क्या?”
“ऐसा लगता है?”
“नहीं”–सब हँस पड़े। नेहा भी।
......उधर शो के दौरान नीमो की नज़र सीढ़ियों के पास वाली खाली पड़ी टेबल पर कई बार जा चुकी थी।

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Ep 11

बैग और मफ़लर सम्हालती, दौड़ती-भागती नेहा ओपेनहाउस कैफ़े पहुँची। हर बार की तरह सीढ़ियों के पास वाली खाली पड़ी टेबल पर बैग रखते ही –

“दिल को तुमसे प्यार हुआ, पहली बार हुआ, तुमसे प्यार हुआ”

नेहा ने मुड़कर देखा। नीमो मुस्कुराया – “मैं भी आशिक यार हुआ, तुमसे प्यार हुआ, पहली बार हुआ”

कैफे में गूँजती वह धुन और वे बोल नेहा के आने का इंतज़ार कर रहे थे, यह बात उस वक़्त नेहा से बेहतर कौन जानता था!  

--

एक रात पहले।

नेहा का मैसेज - ‘दिल को तुमसे प्यार हुआ – RHTDM – अगर चाहो तो, ऑफ कोर्स’

नीमो का मैसेज - ‘ज़रूर सुनाएँगे ये तो <3’

‘थैंक यू! ‘ज़रूर’ पर क्यों इतना स्ट्रेस’

‘हेहे मैंने कोई स्ट्रेस नहीं दिया, ठीक है!’

‘but u will sing this song, no?’

जवाब तब कुछ नहीं आया था।

--

अभी की रात।

कुर्सी पर पैर चढ़ाकर इत्मीनान से बैठी है नेहा।

गाना जारी है – “मैं भी आशिक यार हुआ, पहली बार हुआ” 

…..दिन में एकबार ज़रूर सुनती है नेहा इस गाने को। शो पर एक बार ज़रूर गाता है नीमो ये गाना, नेहा की फरमाइश आए, न आए।

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Ep 12

“दिल्ली में रहते तुम्हारे जयपुर का शो कैसे देखूँ?”
“चलो साथ में”
“मेरा ऑफिस है”
“ओके”
“उनको बोलो तुम्हारे शो को लाइव कर दें अपने पेज पर। मुझे सुनना है” 
“कोशिश ज़रूर करूँगा कि लाइव हो जाए”
“पर मैं उस कैफे का नाम नहीं जानती”
“बता दूँगा”
अगली शाम नीमो की इंस्टा स्टोरी आई – जयपुर के एक कैफे को टैग करती।
............
क्या कैफे ने उस रात लाइव स्टोरीज़ नीमो के कहने पर पोस्ट की थीं - इस उधेड़बुन में फंसी नेहा नीमो को उन स्टोरीज़ के लिए कभी थैंक यू नहीं बोल पाई।
क्या नेहा ने उस रात कैफे की एक भी स्टोरी देखी थी - इस बात से अनजान नीमो उस शो का नेहा से कभी ज़िक्र नहीं कर पाया।

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Ep 13

“कहाँ है?” – नीमो की बहन का फोन आया।
“मेट्रो में”
“मेट्रो क्यों? तू तो कैब से आता है!”
“आज सीपी में शो था”
“ओह! और मैडम मेट्रो से जाती हैं”
“हम्म मैडम मेट्रो से जाती हैं”
खाली कोच में नीमो के ठीक सामने बैठी, उसे देखती नेहा मुस्कुरा दी। नीमो नेहा को बिना देखे ही मुस्कुरा रहा था। 
...कैब से आने-जाने वाले नीमो ने जब एंट्रेन्स पर मेट्रो कार्ड खरीदकर उसमें 2000 डलवाए थे तो, क्या लगता है आपको, उसपर सैनिटाइजर छिड़कती नेहा को इसका मतलब समझ आया होगा?

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Ep 14

“क्या हुआ? आप इतने शांत से क्यों हो गए मेरी बात सुनके?”
“…सुन रही हूँ”
“ओके, पर हम्म तो बोला करो। बोलो ऐसे...हम्म” 
“…हम्म” 
और दोनों फोन पर हँस दिये। इस बात से अनजान कि उस बात को बोलते हुए नीमो में ज़रा कड़वाहट आ गई थी और उस बात को सुनकर नेहा को कुछ अच्छा-सा नहीं लगा था।
बात यह थी – 
“मैं पक्का शो पर आ जाऊँ?”
“हाँ क्यों नहीं?”
“देख लो कहीं ऐसा ना हो कि तुम्हारी उस नई फैन का दिल टूट जाए मुझे देखकर”
“कुछ नहीं होगा”
“तुम्हारा पत्ता तो नहीं कट जाएगा?” – नेहा ने छेड़ा था।
“मेरा पत्ता नहीं कटेगा”
“इतना कॉन्फ़िडेंस?”
“कॉन्फ़िडेंस नहीं, पर मैंने कुछ डिसाइड किया है”
“ओके”
“बताऊँ आपको?”
“बताओ”
कुछ समय की चुप्पी के बाद नीमो ने संजीदा होकर कहा – “आप कह सकते हो कि अब मैं एक ऐसी किताब हूँ जिसे जितनी बार मर्ज़ी हो पढ़ो, पर अब आप इस किताब के पन्ने नहीं फाड़ सकते”
“………………...”
जब नेहा की यह चुप्पी काफ़ी देर तक बनी रही तो नीमो ने पूछा - “क्या हुआ? आप इतने शांत से क्यों हो गए मेरी बात सुनके?” 
--
एक शाम पहले। 
नेहा और नीमो को आपस में कम-से-कम 3 महीने तक डेट ना करने के पीछे का साइंस समझाती नेहा को जब ओपेनहाउस कैफे में चुपचाप बैठे सुनते नीमो ने - ‘दोस्त तो हो न आप? दोस्ती भी एक रिलेशनशिप है। इसे सम्हालकर रखूँगा मैं’ - का जवाब दिया था तो उसके चेहरे पर एक ऐसा भाव था जिसे देख नेहा को उसे ज़ोर से गले लगाकर कभी न छोड़ने का मन कर गया था। 
पर नेहा ने कब अपने मन की तभी सुनी थी...

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Ep 15

“सॉरी, मैं सो रही थी। मैंने सुबह तुम्हारी मिस्ड कॉल देखी”
“कोई बात नहीं” – नीमो ने टेबल पर रखी नेहा की रिस्ट वॉच उठा ली और उसे उलटने-पलटने लगा।
“रात के 2 बजे फोन कर सकते हो, दिन के 2 बजे नहीं कर सकते?” – नेहा की शिकायत।
नीमो ने पलकें उठाकर बड़ी गहरी नज़रों से नेहा को देखा। 
“कल तुम्हारा प्राइवेट शो था ना?” – नेहा का सवाल।
“हम्म”
“तो शो के बाद ऐसे कहाँ बिज़ी हो गए थे तुम कि रात 2 बजे टाइम मिला कॉल करने का?” – नेहा की चुहल।
“मैंने शो के बीच में आपको कॉल किया था”
------
“रात के 2 बजे कोई मिस्ड कॉल नहीं देता नेहा। तुझे फोन उठाना चाहिए था” – नेहा की दोस्त ने उसे बाद में कभी कहा था।

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Ep 16

कैफे में बैठा नीमो रफी साहब के गाने गा रहा था। किनारे पर नीमो के एक दोस्त के साथ बैठी नेहा, कुर्सी पर सिर टिकाए उसके गाने सुन रही थी। पहली दो लाइन के बाद गिटार बजाते नीमो ने नेहा को देखा, मुस्कुराया और आँखें झपकाईं। नेहा ने यहाँ से कुछ कहा। नीमो समझ नहीं पाया। उसने गौर से समझना चाहा, भवें चढ़ाईं, पर जब ना समझ पाया तो नेहा ने इशारे में कहा - ‘कुछ  नहीं’। नीमो ने सिर हिलाकर इशारे में पूछा – ‘क्या?’ नेहा ने इशारे में दुबारा कहा – ‘कुछ नहीं।’ दोस्त दोनों को कुछ शक से देख रहा था।
‘शक’, ‘कुछ नहीं’ और ‘क्या’ के इस चक्कर में सब भूल गए कि गिटार की धुन जारी थी और गाना दो बीट आगे निकल चुका था। सेंट्रललाइट में बैठे नीमो को अचानक अपने स्टेज पर बैठे होने का ध्यान आया, तीसरी बीट पकड़ते हुए उसने लाइन सम्हाली – “ओ कहने वाले मुझको फ़रेबी...” और नेहा को देखा – “कौन फ़रेबी है ये बता” और पूछा – “मैं?”
और नेहा की मुस्कान के साथ गाने पर आगे बढ़ गया – “वो जिसने ग़म लिया प्यार की खातिर.....”
.....नेहा को उस दिन उस पूछे गए ‘मैं’ का जवाब जाने कब तक नहीं सूझा।

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Ep 17

वेयरहाउस कैफे।

अपने शो के ब्रेक के दौरान गुलाबी कैप ज़रा टेढ़ी कर नीमो ने पूछा – “अच्छी लगती है ना मेरे ऊपर?”

फ्रेंचफ्राइज़ खाती नेहा ने आँखें सिंकोड़ी – “ऊहूँ”

नीमो ने तुरंत कैप उतारकर टेबल पर फेंकी – “तो बताना था ना?”

“एक बार फिर पहनना, देखूँ ज़रा फिर से”

“बार-बार बेइज़्ज़ती थोड़े ही कराऊँगा!”

नीमो ने फिर कभी शो के दौरान या कैमरे के सामने कोई कैप नहीं पहनी।

......वह कैप नीमो के दो फैशन स्टेटमेंट में से एक हुआ करती थी।

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Ep 18

“कभी तूने सोचा तू क्यों रहती उदास

पास, जो तू ना मेरे पास”

असीम अज़हर के इस गाने ने उसका ध्यान खींचा।

“समझे ये ना तुझको जैसे हो कोई राज़”

फर्श पर एकटक देखती, कहीं खोई नेहा के चेहरे पर बैठी चिंता और उदासी ने करवट ली। उसने पहले से उसे देखते नीमो को कनखियों से देखा।  

“पास, जो मैं ना तेरे पास” - नीमो ने आगे गाया।  

चेहरे पर बार-बार आते बालों से बेख़बर, कुर्सी की हैंडल पर टिकीं अंगुलियों ने टेबल के कोनों को छुआ। टेबल पर रखी उसकी कॉफी ठंढी हो चुकी थी। एक घूंट में खत्म हो गई। कॉफी का दुबारा ऑर्डर देकर उसने नीमो की ओर नज़र उठाई।    

“जब तक तू चाहे, मुस्कुराए

हँसती रहे सदा

दुआ है मेरी, हमेशा तू खिलती रहे” - गर्दन टेढ़ीकर नीमो जब इस लाइन के साथ मुस्कुराया तो नेहा ने एक गहरी साँस ली और आँखें बंद कर कुर्सी पर सिर टिका लिया।

…..“तुझसे नाराज़ नहीं ज़िंदगी हैरान हूँ मैं” – खत्म होते-होते कुर्सी पर सिर टिकाए नेहा के चेहरे पर मुस्कान आ चुकी थी।  

आख़िर कैफ़े में सिर्फ अपनी मूड के गाने उसे कब तक गाने दे सकती थी वह।

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Ep 19

“मेरा चार्जर वेयरहाउस में रह गया है, पिछले शो पर...” – शो खत्म होते ही नीमो ने कहा।

“तुम्हारा या तुम्हारे फोन का?”

“हाँ? मेरा चार्जर है” - नीमो को नेहा के सरकैज़म और मज़ाक अक्सर समझ नहीं आते थे।

“आता हूँ लेकर दो मिनट में”

“ओके”

नीमो को आते-आते शायद देर हो गई थी। जब वह आया तो नेहा टेबल पर हेड डाउन कर बैठी थी। नज़दीक जाकर देखा। आँखें बंद, नेहा गहरी नींद में।

ओपेनहाउस कैफे में उस वक़्त डीजे नाइट चल रही थी। हर दूसरी-तीसरी टेबल पर कहकहे लग रहे थे और कोने की टेबल पर दोस्तों का एक ग्रुप गाने गा रहा था।

नेहा को माथे पर किसी के प्यार भरे हाथ के रखे जाने का एहसास हुआ। नींद से भरी उसकी आँखें खुलते-खुलते नीमो ने धीरे-से उसका सिर सहलाते हुए अपना हाथ हटा लिया।

“कैफे में कौन सोता है?” – नीमो हँस पड़ा।

वह जानता नहीं था कि यह पहली बार ट्राई की गई बीरा* का असर था। वह यह भी नहीं जानता था कि बीरा ट्राई करने की वजह नेहा का पिछले शो पर लिया गया एक फैसला था जिसे उसने अभी-अभी अगले शो तक टाल दिया था। पहले की मंगाई एक बीरा अब भी टेबल पर पड़ी थी, पर अब उसकी ज़रूरत नहीं थी।  

...काफी सोच-समझकर लिए गए उस फैसले पर कभी काम होगा भी या नहीं, कह नहीं सकते!


*बीयर का एक ब्रांड  

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Ep 20

“50 रुपये हैं, भीख थोड़े ही दूँगी” – ज़रा बुझी आवाज़ में कहते हुए नेहा ने पर्स वापस पॉकेट में डाल लिया।
नीमो ने अपनी वॉलेट से अपने आख़िरी 50 निकाले।
“हमारा मिलाकर अब हो गया ना सौ” – नेहा के 50 लेकर वह स्ट्रीट डांसर की कैप में रख आया।
आप भी अगर देर रात कभी कनॉट प्लेस में रहे हैं तो आपकी मुलाक़ात भी अपने सपने पूरे करने में लगे किसी न किसी स्ट्रीट डांसर से हुई होगी।
इस स्ट्रीट डांसर के दो ही साथी थे – म्यूज़िक और पैसे इकट्ठा करने को फर्श पर रखी उसकी कैप। मेट्रो जाती नेहा के कदम उसके कदमों की थिरकन को देखते ही ठिठक गए थे।      
दो गानों के बाद नेहा ने अपने पर्स में झाँका।
“इससे पेटीएम नंबर नहीं मांग सकते ना”
“कैश दे दो”
“50 रुपये हैं, भीख थोड़े ही दूँगी”
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वॉलेट से अपने आख़िरी 50 निकालते नीमो के सब दोस्त जानते हैं, बिना ज़रूरत वह अपने पैसे ख़ुद पर भी नहीं खर्चता। कंजूस? हाँ, बिल्कुल कह सकते हैं!

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Ep 21

“और सीरियसली वो जैसे देखता है ना तुझे गाते हुए, until and unless वो मास्टर प्लेयर हो, वो नॉर्मल नहीं है”
“सच में?”
“सच्ची”
शाम के चार बजे जब नेहा ने अपनी दोस्त को सीपी बुलाकर, कुछ दिनों पहले लिए अपने फैसले के बारे में बताया था तो दोस्त ने बहुत-सी बातें समझाकर उसे ऊपर की ये लाइन्स कहीं।
“पर यार, इससे तो दिक्कत और बढ़ जाएगी”
“तुझे कैसे मालूम कि ये दिक्कत है?”
“मुझे जिस तरह से उसके शो की आदत हो रही है”
“शो की या उसकी?”
“………….जिसकी भी, एक ही बात है!”
“अच्छा है ना! होने दे आदत!”
“नहीं, आदत का मतलब है दिक्कत। ब्रेक देने का टाइम आ गया है”
“पर.....”
“मैं उसके शो पर अब से नहीं जाऊँगी” 
“तू जाएगी”
“पर...?”
“मेरी बात सुन”
-------
रात के 1 बजे दोस्त ने लिखा - ‘and I am telling you’
‘what’
‘the way he looks at you while singing is not normal’
फैसला टल चुका था। एक बार फिर। फिर कभी के लिए।

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Ep 22

उस रात कोई कुछ नहीं बोल रहा था। गाने वाला गा रहा था। सुनने वाले सुन रहे थे। शो कुछ देर में खत्म होने को था। वो रात थोड़ी चुप थी। शायद नीमो के सेंटी गानों का असर था।
“हमको मिली हैं आज ये घड़ियाँ नसीब से......”
ये गाना वैसे भी दुनिया को एक अलग दुनिया में ले जाता है।
गाने की आखिरी पंक्तियों को गाता नीमो अपनी ही धुन में था – “शायद फिर इस जनम में मुलाक़ात हो न हो...लग जा गले...से” और हड़बड़ाकर उसने– ‘से’ को ‘हे....’ किया। ताल बिगड़ी। धुन बिगड़ी।
नेहा ने उसे देखा। ‘से’ को ‘हे’ करने की उसकी ख़ुद की यह नर्वसनेस उसे पसंद नहीं आई। लिरिक्स ठीक करने की हड़बड़ी की इस एम्बैरेसमेंट को न सिर्फ उसके चेहरे बल्कि उसकी बॉडी लैंगवेज़ ने भी बता दिया। नीमो ने गाना बदल दिया। नेहा उसे देखती रही पर नीमो ने अगले दो गानों तक उससे नज़र नहीं मिलाई।
---
“इट्स नॉट से, इट्स हे – अगली बार अगर तुमने ‘लग जा गले’ के बाद ‘हे’ की जगह ‘से’ गाया तो मैं वहीं स्टेज पर आकर तुम्हें करेक्ट कर दूँगी, याद रखना” – ये धमकी नीमो को दो हफ़्ते पहले दी गई थी।

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Ep 23

“हह् ये क्या बात हुई? क्यों नहीं आओगे शो पर?”
“ऐसे ही”
“आप मेरे सारे शो पर आओगे, ठीक है?”
“सीपी के सारे शो पर”
“सीपी के अलावा भी शो होते हैं मेरे”
“जानती हूँ”
“तो वहाँ भी आने से किसी ने रोका नहीं है। आप आओगे तो मुझे अच्छा लगेगा।”
---
ये तब की बात है जब नेहा ने हल्की-फुल्की नोंकझोंक में नीमो को अपना यह फैसला बताने की कोशिश की थी कि वह उसके शो पर आना बंद करने वाली है। यह बात फिर यहीं ख़त्म हो गई थी।

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Ep 24

“हाफ तो शेयर कर लोगे?”
“मेरे गले के लिए ठीक नहीं”
“मैं पूरा नहीं पी पाऊँगी”
नेहा ने मग में बीरा डाली तो बुलबुले ऊपर तक आ गए।
नीमो मुसकुराया – “ऐसे नहीं डालते”
नेहा की हेल्पलेस मुस्कान।
“अगली बार सिखा दूँगा, अब तो डाल दिया” – कहकर नीमो ने कैन ली और गटागट - एक बार में ख़त्म।
“चलो ट्राई करो। ये तो कर सकते हो आप।”
नेहा ने कोशिश ज़रूर की, पर नाकाम। एक बार में दो घूँट से अधिक उसके बस की बात नहीं थी, सो 7-8 घूँट का इंतज़ार हुआ।
“मेरी आँखों से पता चल रहा है ना?”
पहले “नहीं” के बाद “हाँ”।  
“नशीली आँखें हैं अभी आपकी”
नीमो को वे आँखें हमेशा से पसंद थीं। पर उस रात दोनों की नज़रों में कुछ ऐसा था कि दोनों ने एक-दूसरे से अपनी नज़रें हटा लीं। नेहा ने अपना बैग उठाया, नीमो ने उसकी घड़ी, उसका शॉपिंग बैग, उसका सैनिटाइज़र और अपना गिटार, और हर बार की तरह सीढ़ियों पर उसके पीछे चला। पर जब नेहा सीढ़ियों पर उतरने से झिझकी और उसने नीमो को देखा तो ‘चल तो पा नहीं रहे हो आप’ कहकर नीमो सीढ़ियों पर उतरा, नेहा का हाथ थामा और दोनों धीरे-धीरे कर नीचे उतर चले।
तीन सीढ़ियाँ बचीं थीं जब नीमो ने हौले से नेहा का थामा हाथ अपने गालों से छुआया था, बिलकुल हौले से। नीचे आकर, कैफे काउंटर पर खड़े स्टाफ से दो बातें कर वे आगे चल पड़े।
नेहा के साथ चुपचाप चलते नीमो को ब्लॉक खत्म होने पर रियलाइज हुआ कि वे उल्टी दिशा में चले जा रहे थे।
वापसी में जब कैफे काउंटर वाले से नेहा की आँखें मिलीं तो नेहा और काउंटर वाला, दोनों अपनी मुस्कान रोक नहीं पाए। नीमो की वो झुकी हुई नज़र काउंटर से गुज़रते समय और उसके काफ़ी दूर तक झुकी ही रही।

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Ep 25

एक बार नेहा ने कहा – “मुझे पंजाबी गाने समझ नहीं आते। तुम्हारा वो टुनटुना गाना- क्या हैं उसके लिरिक्स, मतलब समझाना” – नीमो ने गाने की हर लाइन का अर्थ बताया।
“क्यूट लिरिक्स हैं!”
इसके कुछ समय बाद की बात है।
एक बार नीमो अपने फ्लैट के नीचे गाता-गुनगुनाता टहल रहा था – “कि वे पित्ता जान्दे पानी खारा खारा” – नेहा ने ब्लैंक चेहरे से उसे देखा। “मुझे भी पंजाबी नहीं आती। मैं पंजाबी नहीं हूँ। पर मैंने गाने सीखे हैं” – नीमो ने ब्लैंक लुक देती नेहा को क्लीयर किया।
इसके बहुत समय बाद की बात है।
सोमवार की रात वेयरहाउस कैफे में बहुत से हिन्दी गाने गा लिए गए थे, बहुत सी वाहवाही समेट ली गई थी। अब बारी थी हिन्दी से थोड़ा हटकर गाने की। 
“और ये गाना पंजाबी लवर्स के लिए” – नीमो के इतना कहते ही कैफे में सीटियाँ बजीं। दाहिनी ओर की टेबल पर नेहा बैठी थी।
नेहा को देखे बिना नीमो ने गिटार पर धुन छेड़ते हुए कहा - “जिन्हें पंजाबी समझ आती है”

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Ep 26

बहुत सी सॉन्ग रिक्वेस्ट्स के बीच फ़रमाइश एक उसकी ही आती थी।
नीमो हर किसी की सॉन्ग रिक्वेस्ट पूरी करता नहीं, पर फरमाइश का कम से कम एक गाना ज़रूर गाता। कभी लिस्ट के सारे गाने भी गा दिये गए थे, पर वो बहुत पहले की बात है, जब दोस्ती नई थी। आपको याद भी होगा!
ये कहानी नई हुई दोस्ती के काफी बाद की है।  
“ले जा मुझे साथ तेरे, मुझको न रहना साथ मेरे - सुनो, ये फ़रमाइश है” - एक हफ्ते के ऑफिस टूर पर जाने से पहले नेहा ने मैसेज किया था।
आज बहुत-सी रिक्वेस्ट्स के बीच गाना गाते नीमो ने नेहा को देखकर इक्का-दुक्का लाइन्स भी बहुत सम्हलकर गाई थीं। वजह थी – नीमो की एक नई ‘दोस्त’ की शो पर मौज़ूदगी।
पर नेहा को नीमो की किसी दोस्त से फ़र्क नहीं पड़ता। गाते-गाते नीमो ने एक बार तिरछी नज़रों से उसे देखा, मुस्कुराकर उसे ही देखती हुई नेहा ने आँखें झपकाईं, नीमो मुस्कुरा पड़ा और गाने की एक लाइन पूरी हो गई।
और ऐसे कई गानों के बीच लाख याद करने पर भी जब नेहा को ‘ले चल मुझे’ याद ना आया तो उसने ‘दिल को तुमसे प्यार हुआ’ की फ़रमाइश भेज दी। नीमो ने देखकर रख दिया।
“कुछ सॉन्ग रिक्वेस्ट्स हैं” कहकर व्यस्त हुए नीमो ने कुछ गानों के बाद नेहा को देखा। नेहा चुप थी। उसने दो-तीन रिक्वेस्ट्स और गाए। एक नज़र मारी। नेहा अब भी अपनी नेलपॉलिश कुरेदती चुप थी। नीमो ने अपनी नई दोस्त को देखा जिसकी नज़रें नीमो पर थीं। नीमो अब नेहा को देख नहीं पाया।
पर “और एक फ़रमाइश आई है” – गिटार के तार सेट करते हुए नीमो ने जब यह कहा तो वह एक बात जानता था....  
..और बात सच थी, नेलपॉलिश कुरेदती नेहा के चेहरे पर मुस्कान आ चुकी थी।
To be contd…

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Ep 27

Contd..

ऑफिस टूर से शाम को लौटी नेहा उस रात शो पर देर से पहुँची थी। नीमो को इस सरप्राइज़ की उम्मीद न थी।  

नेहा की फ़रमाइश के बाद शो ख़त्म कर नीमो कैफे में बाईं ओर बैठी अपनी नई दोस्त के पास नेहा को बिठा, सिगरेट पीने चला गया। नई दोस्त काफी असहज थी।

दोनों में बातें हुई और आखिरकार असहज नई दोस्त ने पूछा – “आर यू गाइज़ सीइंग ईच अदर?”*

“आई डोंट नो”** – नेहा पूरी तरह झूठ नहीं बोल पाई।

असहज नई दोस्त अभी भी असहज थी। नेहा ने असहज नई दोस्त को देखा। आँखों के वे भाव उसे बिलकुल अपने लगे।

“….वी आर जस्ट फ्रेंड्स सो...इफ यू टू आर थिंकिंग ऑफ डेटिंग ईच अदर, इट्स कूल”*** – दूसरा झूठ, जो काम कर गया।

....दाएँ पिलर की टेबल पर बैठी नेहा ने, शो के दौरान उस रात, नीमो को दो बार अपनी बाईं ओर किसी को देखकर गाने की कोशिश करते देखा था। 

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*“तुम दोनों के बीच कुछ चल रहा है क्या?

**“पता नहीं”

***“हम सिर्फ दोस्त हैं तो...अगर तुमदोनों एक दूसरे को डेट करने की सोच रहे हो तो मुझे कोई दिक्कत नहीं है”

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Ep 28

कुछ समय पहले की एक कहानी है।

कनॉटप्लेस क्लब हाउस के टेरेस पर एक रात एक ड्रंक लड़की बैठी किसी से फोन पर बातें कर रही थी। पाँच साल पहले जिस बेस्टफ्रेंड से उसकी बातचीत बंद हो गई थी, उसके बारे में। जिसके साथ वो अपने उस छूटे हुए बेस्टफ्रेंड की बातें कर रही थी, उसने कहा – “कोई बात नहीं, अब मैं हूँ ना, मैं कभी आपकी लाइफ से नहीं जाऊँगा।”

...कुछ समय बाद की बात है....कुछ से थोड़ा ज़्यादा समय बाद की बात है। ये दोनों अब बात नहीं करते।

ड्रंक लड़की नेहा थी, फोन पर बात करता वो नीमो था। और ये थी उनकी छोटी-सी कहानी।

#कुछ बातें सिर्फ बातें होती हैं   

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​​बाया 

उस काली रात में बाया नदी ने चुपके-चुपके कई उजले आँसू बहाए थे जिसकी ज़िंदा रौशनी की चकाचौंध आज भी मुझे अपनी आँखें बंद करने को मजबूर कर देती है।
यह कहानी जहाँ से शुरु होती है उस वक़्त वहाँ बहुत खुशहाली थी। घर में काफी चहल- पहल थी। महिलाओं का गाना-बजाना चल रहा था, पुरुष भी थोड़ी दूर पर बैठे इसका आनंद ले रहे थे, बच्चे उछलकूद मचा रहे थे। सभी खुश थे। बच्चे की छट्ठी थी। महिलाओं के गानों, पुरुषों के ठहाकों और बच्चों के शोर का जादू अगल-बगल झुंड में खड़े बाँस के पेड़ों पर भी छा रहा था और वे भी झूम-झूमकर मानो इस उत्सव का आनंद उठा रहे थे। यह मकसूदन का घर था। बाँस के झुरमुटों के बीच उगी एक झोपड़ी जिसका रोम-रोम आज पुलकित था।
काफी मन्नतों के बाद मकसूदन की पत्नी की गोद भरी थी। पत्नी का नाम क्या था खुद उसे छोड़कर किसी को भी नहीं पता था, शायद वह भी अब तक अपनी उस पहचान को भूल चुकी थी। पूरे गाँव के लिए वो ‘मकसूदन की कनिया’ थी। लेकिन यह कहानी मकसूदन की कनिया की नहीं है, न ही उस अभागे मकसूदन की। यह कहानी है उन आँसुओं को रोती बाया की जो आज भी किसी काली रात की आहट से घबराती है और गरदन तक अपना सर नदी में घुसाए निश्चिंत बाँस के झुरमुटों में अपने पूरे वजूद समेत छिप जाना चाहती है, मानो वह रात अपना काला आँचल उसके सामने फैलाकर उससे पूछ बैठेगी – क्यों उस रात तू सूख न गई बाया?
उस रात मकसूदन खेत पर था। अंधेरिया रात थी और उसकी कनिया एक हाथ में खाना-लालटेन पकड़े, दूसरे से डेढ़ महीने की बच्ची को गोद में सम्हाले जल्दी-जल्दी पगडंडियों से होकर खेत पर जा रही थी। दूर-दूर तक कोई न था। बस लहलहाते खेत और लहलहाती बाया – दोनों के बीच कनिया के नंगे पैरों का फटाफट निशान लेती सफेद धूल से सनी, चौड़ी, लहराती पगडंडी।
मचान पर बैठे मकसूदन ने अपनी कनिया को आते देखा तो नीचे उतरकर खेत के बाहर आ गया।
“अरे, इसे क्यों ले आई?”
“किसे?”
“मुनिया को”
“तो क्या वहाँ छोड़ आती?”
“चाची को दे आती। कुछ ही देर की तो बात थी। इसे एक हाथ में उठाए-उठाए तुझे कितनी परेसानी हुई होगी”
“अपना कलेजा उठाने में कभी किसी को परेसानी होती है, मुनिया के बापू? ई न होती तो अबतक हम खतम हो गए होते”
सचमुच। मकसूदन जानता है अगर देबी ने अबकी आसीरबाद न दिया होता तो जान तो खतम ही थी कनिया की। छ: साल इंतजार! कौन जनाना कर सकी है आजतक? इंतजार तो उसने भी किया था, नहीं तो बिरादरी वाले तो तीन साल बाद से ही उसके पीछे पड़ गए थे। नई बहू ले आ मकसूदन, इस लुगाई से तुझे कुछ नहीं मिलने वाला। रामकिरपाल काका ने तो एक जगह बात भी बढ़ा दी थी। कितना रोई थी उस दिन उसकी कनिया। चार साल के बच्चे की तरह। रात भर सीने से चिपटाकर रखा था मकसूदन ने उसे। ना। इसकी जगह कोई नहीं ले सकती – उसके गाल पर आँसुओं के साथ फिसलते चले आए काजल को पोंछते हुए उसने कहा था मन में – यही उसकी कनिया हो सकती थी, यही उसकी कनिया है।
लेकिन उस दिन चार साल के बच्चे की तरह रोने वाली उसकी कनिया धीरे-धीरे गाँव वालों के, बिरादरी के ताने सुन-सुनकर बुढ़ाने लगी थी, खतम होने लगी थी। ताने सुनकर आँसू नहीं गालियाँ निकलने लगी थीं, चेहरे के भोलेपन में खिंचाव आ गया था, उदास या मुस्कुराने वाले होंठ बड़बड़ाते रहते थे, चिढ़े-चिढ़े, खिंचे-खिंचे से – लेकिन मकसूदन के लिए फिर भी वही उसकी कनिया थी। उसी दिन वाली, जिसे बैलगाड़ी पर ब्याह कर घर लाया था। आज भी।
उसे पता ही न चला कब उसके हाथों ने कनिया के चेहरे पर बिखरे बालों को पीछे समेट दिया। डेढ़ महीने में फिर से नई होने लगी है उसकी कनिया – हो भी क्यों न, नई-नई माँ जो बनी है!
तरकारी से रोटी छुआती कनिया हल्के-से मुस्कुरा दी।
“बुढ़ा गए लेकिन प्यार जताना नहीं छोड़ा?”
“बुढ़ाएँ मेरे दुस्मन!”

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रुत

रुत को शादी करने का बड़ा शौक था। दसवीं पास कर लिया था और अब शादी का सपना सवार हो गया था।

रुत उन लड़कियों में से थी जिसे गुड़िया खेलना और घर-घर खेलना सबसे अधिक भाता था। घर-घर खेलने में मानो वो अपनी खुद की दुनिया बसती देखती थी। बाकी के दोनों भाई-बहन पढ़े-लिखे, अच्छी-खासी उम्र के होने के बाद शादी करके खुश। लेकिन रुत को पढ़ाई-लिखाई बेकार की चीज़ें लगतीं। बरतन की सफाई में जो सुख है, घिस-घिसकर उसे आईना बनाने में जो मज़ा है वह भला भौतिकी की मशीनों में कहाँ?

सुबह उठते ही वह झाड़ू-पोंछा, बरतन, घर सजाने, खाना बनाने और इन सबके बीच अपनी शादी के सपने देखने में मशगूल हो जाती। उसे कुछ नहीं चाहिए – एक प्यारा सा पति, एक अपना सा घर – जिसे वह अपने हिसाब से सजाती-सँवारती रहे। यहाँ तो वह अपनी पसन्द का कुछ कर ही नहीं सकती – सबके अपने-अपने कमरे हैं – सबका अपना-अपना हिसाब। खुद का भी एक अकेला कमरा होता तो कोई बात होती, वह भी माँ के साथ बाँटना पड़ता है। और अपने घर के ख़्वाब में खो जाती रुत।

बड़े भाई ने बहुत समझाया। पढ़ाई पूरी कर ले रुत, शादी तो होनी ही है। लेकिन ना। पढ़ाई में रुत का बिल्कुल मन नहीं लगता। क्यों करे वह पढ़ाई जब उसे शादी ही करनी है!

तो रुत दसवीं पास ही रह गई और उसकी माँ ने उसके लिए कोई लायक लड़का ढूँढना शुरु कर दिया। और इस बात पर बड़े भइया ख़फ़ा हो गए। माँ-रुत एक तरफ और भइया एक तरफ। दीदी की तो पहले ही शादी हो चुकी थी। लेकिन रुत उस शादी से खुश नहीं थी – ऐसी क्या शादी जिसमें दोनों जन दिन भर नौकरी ही करते रहो।

ख़ैर, तो भइया ख़फ़ा होकर चले गए अपने शहर हैदराबाद और माँ फिर से अपने कर्तव्य की जल्दी से जल्दी पूर्ति में लग गई।

रिश्ता आया। बुआ के यहाँ से। लड़का अकेला था। अकेला मतलब न माता-पिता, न भाई-बहन। हॉस्टल में रहकर पढ़ाई कर रहा था जब भूकम्प में घर के सभी सदस्य मारे गए थे।

बुआ ने बताया कि लड़का अच्छा है। हालांकि उस हादसे के बाद उसने पढ़ाई छोड़ दी और अभी किसी स्टील की कम्पनी में नौकरी करता है। माँ सुनते ही तैयार। बुआ पर उन्हें पूरा भरोसा था। हो भी क्यों न, बहू भी तो वही ढूँढ कर लाईं थीं। और जब रुत को ये बात पता चली तो उसकी खुशी की सीमाएँ न रहीं, कल्पनाएँ शुरु हो गईं!

शादी, घर और बच्चे – यही उसकी दुनिया थी। जैसे-जैसे शादी की तारीख़ नज़दीक आती गई, रुत की पलकें सपनों से भारी होती गईं।


तैयारियाँ अपने परवान पर थीं, इसी बीच बड़े भइया को एक गुमनाम पत्र आया। पत्र लिखने वाले ने अपनी पहचान छुपाते हुए लिखा था कि लड़का कुछ बुरी आदतों का शिकार है। कैसी बुरी आदतें? यह नहीं बताया गया था। भइया गाँव आए। बुआ को बुलावा भेजा।

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बोहिमियन वो लड़की

वो बोहिमियन लड़की अकेली चलती थी। डरती नहीं थी। प्यार भी खूब करती थी। हर किसी से दिल्लगी करती थी। किसी को भी देखकर मुस्कुरा देती थी।

तीस साल से ऊपर की हो चुकी थी पर बच्चों और लड़कों के साथ कहीं भी क्रिकेट, फुटबॉल खेलने लगती थी। बारिश में भीगती थी और बूंदों को हथेलियों में लेकर, ऊपर देख, आँखें मूंदे जाने क्या सोच मुस्कुराती थी। कहीं भी जाती थी, कुछ भी पहनती थी। घुमक्कड़ थी। उसकी एक दोस्त भी थी पर उसे बारिश में किसी से प्यार हो गया था और वो उसी के साथ रुक गई थी वहीं। इसे? इसे किसी एक से प्यार हो ही ना पाता था सो ये कहीं रुक ही ना पाती थी। बस चलती रहती थी, भागती रहती थी – हर जगह से, हर किसी से। किसी के भी साथ चलती। पर कोई पीछे से बुलाता तो मुड़ती नहीं।

उसे याद ना रखने की बीमारी थी। कोई चीज़ मेमोरी लेन में चली जाती तो ये उसे भूल जाती – लोगों को, रास्तों को, यादों को सबको भूलती जाती। पर सामने की हर चीज़ को प्यार करती।

जो उसे समझते वो भी उसे सनकी कहते, जो ना समझते वो भी सनकी कहते। बोहिमियन लड़की यह सब नहीं सुनती। उसे सब पसंद थे इसलिये वो उनकी बातों को समझने की कोशिश नहीं करती बस मिलती जाती और चलती जाती।

एक दिन काली घटा आई। लड़की रास्ते के किसी पेड़ पर चढ़ी बैठी थी और पड़ोस की नदी को देख रही थी। काली घटा ने हवा को बुलाया और हवा ने पत्ते उड़ाए। बारिश, हवा और पत्तों के बीच खूब रोमांस हुआ। Awesome Threesome कहकर बोहिमियन लड़की हँस पड़ी और नदी को आँख मारकर ज़मीन पर उतर पड़ी। उसे नदी के उस छोर पर एक मल्लाह दिखा। ... 

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घिरनी दादी

“हम नौ साल में बिहा गये थे बेटा। तुम्हारे दादाजी का तब सतरहवाँ साल शुरु हुआ था। हमारी छटपटाहट, हमारा डर, हमारा हदस और हमारा बचपन किसी को नहीं दिखता था। सबको जल्दी थी, जल्दी से हमको घरनी बना देने की।

शुरू में बहुत घबराए, बहुत भागे। पर कहाँ तक। आँगन से छत तक, कमरा से बाथरूम तक। बस। तीन – साढ़े तीन महीना में पक्की घरनी बन ही गए।

लेकिन अपने कमरा में जाने को जो डर था, उसमें घरनी न बन पाए।

बबलू के बाबूजी का भी दोस नहीं था। नए नए जवान हो रहे थे। इतनी गोरी मेहरारू मिल गई अब कितना धैरज रखते।

याद है हमको। ठीक छै महीने बाद सास ने हमको हमारे माइके भेजा था। साथ में बबलू के बाबूजी और नौकर भी था। इक्का ‘बाउनी’ नदी पार करता और हमारा घर आता, इससे पहले ही रोने लगे हम। खुसी के आँसू थे, लेकिन लोग-बाग थोड़े ही समझते। बबलू के बाबूजी तो वापस जाने को तैयार। ऐसी कलपती हुई बहू को ले जाएँगे तो सब कहेंगे कि बहू खुस नहीं अपने ससुराल में।फिर नौकर के बहुत समझाने-बुझाने और मेरे एकदम दम साधकर चुप हो जाने पर इक्का आगे बढ़ा।

गाँव पहुँचे तो लगा जेल से छूट आए। अब तो हँसी आती है। वही जेल अब हमको सबसे ज्यादा मुक्ति देती है।

नहीं आने के लिए माँ से लड़ाई किए, रूठे, रोए, जाके फुलवारी में छिप गए और ये परारथना तक कर डाले कि इक्का का घोड़ा मर जाए। ... 

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कैनवस

मैं खिड़की के भीतर हूँ और बाहर रात का आकाश काले, भूरे व गहरे लाल रंग से भरा हुआ है। अन्धेरे में खड़े पेड़ के सभी पत्ते एक-दूसरे में मिल गए हैं और उनसे होता हुआ काला रंग सड़क पर पसरता जा रहा है। ठंढ के कारण बाहर धुंध है और इस धुंध में स्ट्रीट लाइट की पीली, मद्धिम रौशनी कई-कई कणों में बिखरती हुई इधर-उधर अपनी जगह तलाश रही है।

स्ट्रीट लाइट की फीकी-सी रौशनी में दिखता यह सबकुछ खिड़की की सीमा में एक कैनवस की तरह है।

खिड़की का यह कैनवस अपने दाएँ-बाएँ तरफ हल्के नीले रंग के परदों को समेटे है जो बाहर फैले गाढ़े रंगों व स्ट्रीट लाइट की हल्की पीली रौशनी से बिल्कुल भी मेल नहीं खा पा रहा।



मैं खिड़की के भीतर से बाहर के इस कैनवस को देखती हूँ और सोचती हूँ, यदि कोई खिड़की के बाहर खड़ा हो और खिड़की के भीतर के इस कैनवस को, जहाँ मैं बैठी हूँ, देखे तो उसे इसमें पीली स्ट्रीट लाइट की जगह सफेद ट्यूबलाइट दिखेगी, पेड़-पत्तों पर पसरे काले रंग की जगह मेरे बिस्तर पर बिछे चादर के हल्के हरे, नीले, पीले, सफेद ‘चेक’ रंग मिलेंगे और अन्धेरे के कारण आपस में मिले-जुले पत्तों के स्थान पर टेबल-कुर्सी पर बैठी एक लड़की दिखेगी जो कमरे में फैली सफेद रौशनी के बीच अपने ऑफ व्हाइट रंग के कपड़ों के कारण आसपास रखी किसी चीज़ से नहीं मिलती-जुलती।


खिड़की के बाहर से भीतर की ओर दिखने वाला कैनवस और खिड़की के भीतर से दिखने वाला बाहर का कैनवस एक-दूसरे से काफ़ी अलग है और ऐसा सिर्फ उन दीवारों से है जिसके अन्दर मैं हूँ और बाहर खिड़की का कैनवस।

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