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Poetry

कविता ख़ुद मेरी कवि है 

रचती है मुझे

​बसकर मुझमें, बसाती है मुझे

Poetries: Work

अफ़सानों के गिरेबाँ में झाँकना 

तो हमें याद करना 

दीवानों के कारवाँ में झाँकना 

तो हमें याद करना। 

जब मिल ना पाए 

ग़म में कोई हँसने वाला 

जीने की तमन्ना में बसने वाला 

तो नज़र उठा के आसमाँ में झाँकना 

औ' याद करना। 

परदों से खिड़कियों को

जो न ढँक पाया 

आँखों से आँसुओं में 

ना बरस पाया 

हो सके तो उसके गुनाहों को 

कभी माफ़ करना।  

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Poetries: Welcome

तुमसे किसने कहा

कि आया न करो

बस आकर यूँ पास से जाया न करो


तुमसे किसने कहा

कि तुम्हारी ज़रूरत नहीं

बस अपनी आदत यूँ लगाया न करो


तुमसे किसने कहा

कि न मिलो अकेले में तुम

बस मुसाफ़िरों की तरह वक़्त बिताया न करो

Poetries: Text

शरणार्थी

मैं जा रही थी 

रास्ते में मिली हवा 

उसने पूछा - "शरणार्थी हो क्या?"

मैंने कहा - "नहीं, मेरा घर है यहाँ।"

मैं चल पड़ी। 

रास्ते में मिले खेत 

सरसों ने पूछा - "शरणार्थी हो क्या?"

मैंने कहा - "नहीं, मेरा घर है यहाँ।"

​मैं चल पड़ी। 

रास्ते में मिली गौरैया 

उसने पूछा - "शरणार्थी हो क्या?"

मैंने कहा - "नहीं, मेरा घर है यहाँ।"

​मैं चल पड़ी। 

रास्ते में मिली नदी 

उसने पूछा - "शरणार्थी हो क्या?"

मैं चीखी - "नहीं, मेरा घर है यहाँ।"

और ​मैं दौड़ी। 

और फिर, कोई नहीं मिला। 

घर पहुँची। 

माँ थीं, 

उन्होंने दरवाज़ा खोला।

"माँ, क्या मैं शरणार्थी हूँ?" - मैंने पूछा। 

वे मुस्कुराईं, 

मेरा सर सहलाया और कहा - "हाँ" 

"यह तेरा घर नहीं, 

एक छोटा-सा शरण-स्थल है।"

मैंने फिर यही कहा - 

"हाँ, मैं शरणार्थी हूँ। 

सुना न तुमने ऐ हवा, सरसों के खेत, पंछी, नदिया!

​तुमने सुना ना!" 

Poetries: Text

शाम थी 
और थी तुम 
.......
क्या कहूँ 
कितनी अपनी हुई थी 
वो मटमैली धुंध 
सांवला वो आकाश 
गीली रिमझिम बारिश.. 
ज़बाँ की हमारी चुप्पी 
और मन की बतियाती आवाज़ 
............................
तुम और वो एक 
धुँधलाई सी शाम

Poetries: Text

इस खौलते पानी में हाथ डुबाए ​

हम लोग 

जाने कब तक बैठे रहेंगे 

एक-दूसरे को आँखें तरेरते 

जाने कब तक ऐंठे रहेंगे, 

कितनी बार 

बोलती आवाज़ों का गला दबाएँगे 

समुदायों को 

गिरोहों के किलों में सजाएँगे,

कब तक यूँ 

अपने ही बनाए धरातलों में 

​सिमटते जाएँगे?

Poetries: Text

मन के भीतर कोलाहल में 

जब तेरा चेहरा आए 

मैं चुपके से दिल में सोचूँ 

तनहाई ना खिंच जाए। 

तेरी आँखें खुशकिस्मत सी 

जब चाहें तब घिर आएँ 

मेरा दिल आवारा पंछी 

छोड़ गया तो ना आए। 

एक बार जो उठा वहाँ से 

ना जाने अब कहाँ फिरे 

भूल गया दिल उधर के रस्ते

तू क्यों फिर इस तरफ मिले। 


मैं ना जानूँ उस मंज़िल को 

जिसको राहें भूल गईं 

फिर क्यों उठता है तू अक्सर 

ढूँढे उसको कहाँ गईं। 


वो न रहा ना होगा फिर अब 

जिसको माँगे इन हाथों में 

कह दे इन दोनों आँखों को 

पलकें वो अब नहीं रहीं। 


तेरे सहारे, सभी किनारे 

हाथ पसारे उसे पुकारे 

पर तू ना जाने पागल रे 

वो ना आए भूले-हारे। 


छूटे सब जो उसके अपने 

रूठे कब वो जाने सारे 

मैं भी ना खोजूँ अब उसको 

वो मुझको भी भूल चला रे। 


ना आएगा तेरा था जो 

ना आएगा इस रस्ते को 

भूल गया वो भूल जा तू भी 

इस जंगल को, उस क़स्बे को। 


तू भी जा अब, मुड़ जा वापस 

जा, तू भी ना आना वापस 

तू भी अब जा यहाँ, इधर से 

जैसे वो चल दिया इधर से। 


मन के भीतर कोलाहल में 

भीड़-भाड़ रहने दे थोड़ी 

अपने उसको पाने वापस 

मत आना इस, उस, जिस पल में।  


Poetries: Text

कभी सोचा है?

आपने कभी सोचा है 

कि 

सड़क दुर्घटना में ज़िंदगी और मौत से जूझते 

किसी व्यक्ति को देखकर 

हमारी आँखें क्यों नहीं भरतीं?

कि 

फुटपाथ पर बैठे किसी बच्चे को देखकर 

आपको उसपर प्यार क्यों नहीं आता? 

कभी गौर किया है 

कि 

जब जीती-जागती मुर्गियों को 

मुर्दा चिकन में तब्दील करने ले जाया जा रहा होता है 

तो उनके पंखों की फड़फड़ाहट में 

उनकी छटपटाहट हमें क्यों नहीं दिखती?

कि 

अपने गमलों में पानी देते वक़्त 

पड़ोसी के मुरझाए पौधों की ओर 

आपका ध्यान क्यों नहीं जाता?

कभी गौर किया है 

कि 

जब बिल्ली के कई बच्चे 

एक कोने में दुबके होते हैं 

तब नज़र पड़ने पर भी 

हम उन्हें क्यों नहीं पुचकारते?

कि 

भीषण गर्मी में जब कुछ लोग 

सड़क पार करने के लिए खड़े होते हैं 

तो 

अपनी गाड़ी की रफ़्तार कम कर 

उन्हें जाने देने का आपका मन क्यों नहीं करता? 

कभी गौर किया है 

कि 

सरकार पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाते वक़्त 

अपने गिरेबाँ में झाँकने की हमारी हिम्मत क्यों नहीं होती?

कि 

हमें उस वक़्त कोई फ़र्क क्यों नहीं पड़ता 

जब हम अख़बार के पन्ने पलटते हैं?

कभी गौर किया है 

कि

सुबह-शाम मिलने पर भी 

हम सामने वाले पर विश्वास क्यों नहीं करते? 

कि 

बारिश में मन होते हुए भी 

क्यों हम जी भरकर गीले नहीं होते?

कि 

क्यों हम एक-दूसरे को 

बस तुलनात्मक दृष्टि से देखते हैं?

कभी गौर किया है 

कि 

क्यों हम ज़िंदगी को 

एक ढर्रे पर जीने के आदी हो गए हैं?

कि

क्यों नहीं हम अपनी खोल से निकलते हैं?

कि 

क्यों हम 'हम' न रहकर 'मैं' हो गए हैं?

​कभी सोचा है.....आपने? 

Poetries: Text

हाँ तुम बोलते नहीं 

ताकि वो सुन सके तुम्हें 

अपनी नीली आँखों में  बुन सके तुम्हें 

तुम कुछ नहीं कहते 

और वो जाने किस दुनिया की एक लड़की 

तुम्हें सुनती रहती है 

तुम्हारी अनकही में 

अनसुनी-सी 

ख़ुद को बुनती रहती है...

पारिजात और परियों की कहानी है ये 

पारिजात 

और 

परियों 

​की कहानी है ये.. 

Poetries: Text

Rusted we are and ruins we have,

for, rumours we live and raffish we smell

Amid this chaos, amid all this chaos

we crack a smile, a disrupted smile

to vanish in the spoiled cold thin air 

for how long, for how long? why must we care

An uncertainty arises like a beautiful mirage

but we heed and we hide, but we barely surpass

for, we are the daunted answers of the fickleness of disquiet questions 

we are the daunted answers of our own numb reflections 

Poetries: Text

डूब जाऊँ मैं तुझमें

ताकि पार पा जाऊँ तुझसे

जल जाऊँ तुझमें

ताकि जल उट्ठे नाम की तेरी बाती


ना नाम रहे, ना मैं रह जाऊँ

तू मुझमें, मैं तुझमें हो जाऊँ

ना डुबोए मझधार, ना बचाए माझी

ना अगन बचे, ना दीप बचे साझी

लौ रहे, लौ गीली रहे

लौ गीली रहे, डूबी हुई

जलती हुई, लौ गीली रहे

Poetries: Text
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